
सारंगढ़ बिलाईगढ़@न्यूज़ दर्शन। सारंगढ़-बिलाईगढ़ छत्तीसगढ़ जिले से एक ऐसा सनसनीखेज मामला सामने आया है, जिसने राज्य प्रशासन की साख को धूल में मिला दिया है। एक युवा पत्रकार को सिर्फ इसलिए सरकारी दफ्तर में लात-घूसों से पीटा गया क्योंकि उसने किसान सम्मान निधि से जुड़ा एक ‘कड़वा’ सवाल पूछ लिया था। पत्रकार को बचाने आए एक वकील को भी नहीं बख्सा। अमानवीय कृत्य के बाद छत्तीसगढ़ में पत्रकारों की सुरक्षा और अभिव्यक्ति की आजादी पर गंभीर प्रश्नचिन्ह लग गए हैं। यह घटना एक सामान्य विवाद नहीं, बल्कि प्रशासनिक गुंडागर्दी का चरम उदाहरण है।

किसानों का सवाल, अधिकारी का खूनी वार!
खबरों के मुताबिक, युवा पत्रकार पोषराम साहू, जो जनसरोकारों की पत्रकारिता के लिए जाने जाते हैं, किसान सम्मान निधि योजना के क्रियान्वयन में हो रही भारी अनियमिताओं और किसानों की शिकायतों को लेकर जमीनी हकीकत टटोल रहे थे। इसी सिलसिले में वे संबंधित कृषि विस्तार अधिकारी के दफ्तर पहुँचे। पत्रकार ने जब किसानों की परेशानी और योजना की पारदर्शिता से जुड़े सवाल पूछे, तो अधिकारी बौखला उठा। अपनी नाकामी और भ्रष्टाचार के सवालों से असहज होकर अधिकारी ने अपना मानसिक संतुलन खो दिया। उसने न केवल अभद्र भाषा का प्रयोग किया, बल्कि पत्रकार के साथ दफ्तर के भीतर ही कथित तौर पर बुरी तरह मारपीट शुरू कर दी।

लोकतंत्र के रक्षक ही बने भक्षक!
यह घटना तब और भयावह हो गई जब मौके पर मौजूद एक जागरूक वकील ने बीच-बचाव कर पत्रकार को बचाने की कोशिश की। आरोप है कि सत्ता के नशे में चूर अधिकारी ने वकील को भी नहीं बख्शा और उनके साथ भी हाथापाई और अभद्रता की। दफ्तर के अंदर मची इस चीख-पुकार और सरकारी गुंडागर्दी को देखकर मौके पर मौजूद लोग सन्न रह गए। यह घटना यह सोचने पर मजबूर करती है कि अगर एक सरकारी अधिकारी जनता के बीच काम करने वाले पत्रकार और वकील के साथ ऐसा सुलूक कर सकता है, तो आम नागरिक की क्या बिसात?
आक्रोश की आग: छत्तीसगढ़ में हड़कंप
इस जघन्य कृत्य की खबर आग की तरह फैलते ही स्थानीय लोगों और पत्रकारों में भारी आक्रोश व्याप्त हो गया है। स्थानीय पत्रकार संगठनों ने एक सुर में इस घटना की कड़ी निंदा की है और इसे प्रेस की आजादी पर कायराना हमला बताया है। संगठनों ने स्पष्ट शब्दों में कहा है कि अगर दोषियों पर तत्काल सख्त कार्रवाई नहीं की गई, तो वे सड़कों पर उतरेंगे।
विपक्ष ने घेरा, प्रशासन की चुप्पी पर सवाल
इस घटना ने छत्तीसगढ़ की कानून-व्यवस्था और प्रशासनिक जवाबदेही पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। विपक्षी दलों और सामाजिक संगठनों ने इस मामले को गंभीरता से लेते हुए सरकार को आड़े हाथों लिया है। उन्होंने इसे राज्य की लचर कानून-व्यवस्था का सबूत बताते हुए निष्पक्ष जांच की मांग की है। सोशल मीडिया पर भी इस घटना की तीव्र भर्त्सना हो रही है।
क्या मिलेगा न्याय?
फिलहाल, पीड़ित पत्रकार द्वारा पुलिस में शिकायत दर्ज कराने की प्रक्रिया जारी है। पूरा छत्तीसगढ़ अब यह देख रहा है कि राज्य की भूपेश बघेल सरकार और स्थानीय प्रशासन इस मामले में क्या कार्रवाई करता है। क्या इस ‘सरकारी गुंडे’ को बचाने की कोशिश होगी या फिर पीड़ितों को न्याय मिलेगा? यह घटना यह तय करेगी कि छत्तीसगढ़ में प्रेस स्वतंत्र है या फिर सरकारी दमन के आगे नतमस्तक हो चुकी है।



